Delhi Bhargava Sabha दिल्ली भार्गव सभा (रजि0)

अतीत के झरोकों से

125 वर्षों की गौरवशाली सामाजिक, सांस्कृतिक एवं सेवा यात्रा

हम सब महर्षि भृगु की संतान कहलाने में गर्व अनुभव करते हैं। भगवान परशुराम हमारी जाति के ज्योति स्तंभ हैं। वीर विक्रमादित्य सम्राट हेमचन्द्र ढूसर (भार्गव) ‘‘हेमू‘‘ हमारी जाति के लिए गौरव ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत की आन हैं। भक्त प्रवर संत चरणदास का जन्म हमारे ही समाज में हुआ। ऐसे महान व्यक्तित्व वाले समाज में हमें भार्गव शब्द से गौरव की अनुभूति होती है।

देश व समाज में कुछ ऐसी भी विभूतियाँ होती हैं जिनके सतत् प्रयासों एवं सेवाओं से समाज लाभान्वित होता है। आज से 125 वर्ष पूर्व ऐसी ही महान विभूतियों ने भविष्य का ध्यान रखते हुए आपस में प्रेम व भाईचारा बढ़ाने के उद्देश्य से एक नन्हें से पौधे के रूप में ‘‘दिल्ली भार्गव व हितकारिणी सभा‘‘ का गठन किया, जो आज वटवृक्ष की भाँति हमारे समाज की कल्याणकारी छतरी के रूप में स्थित है।

उस समय दिल्ली बहुत सिकुड़ी थी और भार्गव परिवार दरियागंज व चाँदनी चैक के आस-पास ही बसे हुए थे। जैसा कि सभा के नाम से पता चलता है कि इसका मुख्य उद्देश्य भार्गव बन्धुओं की भलाई के लिए काम करना व उसके सुख दुःख में भागी होना रहा। दिल्ली भार्गव बन्धुओं ने कन्धे से कंधा मिलाकर काफी सहयोग दिया। वे समाज में घुसे हुए असामाजिक तत्वों को दूर रखने व सामाजिक समस्याओं को सुलझाने हेतु सदैव प्रयत्नशील रहे।

समाज निर्माता

समाज के प्रेरणास्रोत

पं. रोशन लाल, डाॅ. पृथ्वी नाथ, पं. हरिकृष्ण (वकील), पं. हरिकृष्ण (आईस मशीनरी मार्ट), सेठ फूल चन्द, सेठ फतेह चन्द, श्री हरिहरनाथ (हल्लूजी), श्री सुन्दर लाल, पं. दीनानाथ दिनेश, श्री गोपीनाथ, श्री विशेश्वर नाथ, श्री भगवती प्रसाद, राय साहब गंगासरन, पं. राम गोपाल, पं. जयनारायण, पं. हेमचन्द्र, मास्टर रामजीलाल, पं. जयन्ती प्रसाद, श्री मोहन लाल, श्री मनोहर लाल, श्री नवीन जी विशेष उत्साह व लग्न से कार्य करते थे।

1941

सत्संग भवन एवं सामाजिक गतिविधियाँ

1941 के बाद स्व. पं. हेम चन्द्र जी भार्गव ने सत्संग भवन, दरियागंज में बैठकें व विवाह आदि के लिए स्थान उपलब्ध कराने में सहयोग दिया।

सर्वश्री विष्णु नारायण जी, रामनाथ जी, दयाकिशन जी, त्रिलोकी नाथ जी और ईश्वर दयाल जी के परिश्रम से अनेक वर्षों तक लायबे्ररी का काम सुचारू रूप से सत्संग भवन में चलता रहा।

इसी समय भार्गव स्पोर्ट्स क्लब का भी गठन किया गया, जो हाॅकी के लिये खिलाड़ियों को तैयार करती थी। उस समय दिल्ली के मुख्य चार कालेजों के कप्तान हमारे भार्गव युवा ही थे जो समाज के लिये गौरव की बात थी।

1943

सभा का नाम परिवर्तन

कालान्तर में हमारी सभा का नाम भी दिल्ली भार्गव हितकारिणी सभा से बदल कर भार्गव यंग मैन ऐसोसिएशन रखा गया। यह ऐसोसिएशन अनेकों वर्षों तक भार्गव बन्धुओं की सेवा करती रही।

समय करवट बदलता रहा और वर्ष 1943 के बाद अखिल भारतीय भार्गव सभा के निर्देशानुसार सभा का नाम ‘‘स्थानीय भार्गव सभा‘‘ व बाद में ‘‘दिल्ली भार्गव सभा‘‘ रखा गया।

सामाजिक परंपरा

प्रेम, सहयोग एवं सेवा

आरम्भ में हमारी सभा के श्री हज्जू नाई व श्रीमती खजानों घर-घर जाकर चन्दा एकत्रित करते व एक-दूसरे का कुशलक्षेम तथा निमंत्रण देने आदि का काम भी करते थे अथवा यों कहें कि वह संदेश वाहक के रूप में समाज की सेवा करते थे।

आपस में प्रेम व भाईचारे का पता इस बात से चलता है कि उस समय प्रत्येक परिवार से एक-एक रुपया लड़के की शादी में घुड़चढ़ी पर व लड़की की शादी में खीसी पर देना अपना सौभाग्य समझते थे।

1985-86 में निश्चिय किया कि दिल्ली भार्गव सभा कल्याण निधि के अन्तर्गत प्रत्येक कन्या के विवाह पर सभा की तरफ से उपहार दिया जाये तथा किसी की मृत्यु पर पुष्पांजलि अर्पित की जाये।

कार्य क्षेत्र

चार जोन एवं 30 क्षेत्र

इस समय वृहत् दिल्ली को सभा ने सुविधानुसार एवं सुचारू रूप से काम चलाने के लिए चार जोन व 30 क्षेत्रों में विभाजित किया है।

प्रत्येक क्षेत्र से एक उप प्रधान व एक मंत्री और प्रत्येक क्षेत्र के लिये एक सदस्य नियुक्त किया जाता है। जो अपने क्षेत्र के परिवारों से सम्पर्क स्थापित कर उनका कुशलक्षेम पता करते हैं और निधन पर पुष्पांजलि एवं विवाह पर सभा की तरफ से उपहार देना अपना कर्त्तव्य समझते हैं।

सभा की कार्यकारिणी में एक प्रधान, चार उप प्रधान, एक मुख्य सचिव, चार सचिव, एक कोषाध्यक्ष तथा 30 सदस्य होते हैं।

स्नेह सम्मेलन

सांस्कृतिक एवं सामाजिक आयोजन

वर्ष 1985-86 से कार्यकारिणी के निर्णयानुसार नरेन्द्र जी के सुझाव पर प्रत्येक वर्ष संभवतः 2 अक्टूबर को स्नेह सम्मेलन आयोजित होता था।

जिसमें सांस्कृतिक कार्यक्रम, मेघावी छात्रों का सम्मान, वरिष्ठ सदस्य की 70वीं वर्षगाँठ पर स्मृति चिन्ह देकर व शाल ओढ़ाकर सम्मानित करना, वैवाहिक नीलम जयन्ति 45 वर्ष पर सम्मान, चित्रकला प्रतियोगिता, बेबी शो व सामूहिक भोजन शामिल होते थे।

बर्तन फण्ड

सामुदायिक सहयोग व्यवस्था

बन्धुओं की बढ़ती हुई आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए 1941 में एक बर्तन फंड का गठन किया गया।

गैस के चूल्हों के अतिरिक्त खाना बनाने व खाना खाने के बर्तन शादियों व अन्य अवसरों के लिये उपलब्ध थे।

पं. किशोरी लाल जी द्वारा सत्संग भवन में इस कार्यभार को आरम्भ से ही सुचारू रूप से चलाने के बाद अब श्री नरेन्द्र जी सत्संग भवन इस कार्य को देख रहे हैं।

निधियाँ

कल्याण एवं सहायता कोष

वर्ष 1972 के भार्गव सम्मेलन में बचत की राशि 15,000/- रुपये, ब्याज तथा दान से प्राप्त 1,032/- रुपये से कल्याण निधि की स्थापना की गई।

इससे अर्जित व्याज से निराश्रित, जरूरतमन्द को चिकित्सा, विवाह तथा शिक्षा हेतु अनुदान दिया जाता है। मेघावी छात्रों को रजत पदक, प्लेट आदि भी इसी निधि के अन्तर्गत दिये जाते हैं।

आज वरिष्ठ सदस्यों का सम्मान, वैवाहिक स्वर्ण जयन्ति पर सम्मान इसी के अन्तर्गत किया जाता है तथा इसका नाम परिवर्तित कर समाज कल्याण निधि कर दिया गया।

दिल्ली भार्गव सभा द्वारा समाज के कमजोर वर्ग को सहायता देने के लिए 2008 में एक समाज कल्याण कार्पस फंड की स्थापना की गई।

दिल्ली भार्गव सभा कार्पस फंड - दिल्ली भार्गव सभा द्वारा अपने कोष की वृद्धि करने के लिए 1996 में एक कार्पस फंड की स्थापना की गई।

मेडिकल कार्पस फंड - दिल्ली भार्गव सभा द्वारा समाज के कमजोर वर्ग को सहायता देने के लिए 2008 में एक मेडिकल कार्पस फंड की स्थापना की गई।

संत चरणदास

धार्मिक एवं ऐतिहासिक धरोहर

दिल्ली भारत की राजधानी होने से दिल्ली के बनने व उजड़ने तथा अपने नाम बदलने के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है यह तो वह दिल्ली है जहाँ संत चरणदास जी ने तपस्या की थी।

वह स्थान पेड़ जिसके नीचे तपस्या की तथा उनका चोगा आज भी चर्खेवालान दिल्ली में स्थित है।

दिल्ली का ही पुराना किला जहाँ वीर विक्रमादित्य ढूसर (भार्गव) का राज्याभिषेक 6 अक्टूबर 1556 को हुआ। उनकी विजय और वीरतापूर्ण इतिहास की पुराने किले की दीवारें आज भी साक्षी हैं।

दिल्ली में बोडिंग हाऊस 1927 से 1929 तक चालू रहा, जो शिक्षा की महत्ता और भविष्य की दूरदर्शिता को दर्शाता है। छात्रों की संख्या केवल पाँच होने से 1929 में बोडिग हाऊस बन्द करना पड़ा।

दिल्ली भार्गव सभा द्वारा 2002 में संत चरण दास निधि की स्थापना की गई। इसके अन्तर्गत कोई भी सदस्य अपनी या अपने परिजन की स्मृति में निधि स्थापित कर सकता है।

डायरेक्ट्री

समाज अभिलेख एवं प्रकाशन

आरम्भ में दिल्ली भार्गव परिवारों की मेलिंग लिस्ट ही दिल्ली डायरेक्ट्री का काम करती थी। बाद में मेलिंग लिस्ट व डायरेक्ट्री को अलग-अलग रूप दिया।

प्रथम डायरेक्ट्री में घर के मुखिया का नाम, पता, व्यवसाय व दूरभाष नम्बर आदि सूचनाएँ निहित थीं। द्वितीय संस्करण में कुछ सुधार लाया गया।

किन्तु वर्ष 1999 में अखिल भारतीय भार्गव सभा की नेशनल डायरेक्ट्री के प्रारूप में एक डायरेक्ट्री का प्रकाशन किया गया, जिसे अखिल भारतीय भार्गव सभा के प्रारूप के आधार पर प्रथम डायरेक्ट्री कहलाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

द्वितीय संस्करण 2002, तीसरा संशोधित संस्करण 2011, चौथा संशोधित संस्करण 2023 में प्रकाशित किया गया।

दर्शिका

समाचार एवं साहित्यिक योगदान

समाचार दर्शिका के लिये हम इसके संस्थापक स्व. श्री नवीन चन्द्र जी भार्गव, स्व. श्री विष्णु कुमार जी एवं श्री योगेश जी व श्री संजीव जी के आभारी हैं जिनके प्रयत्नों से प्रकाशन समय पर हो रहा है।

कई वर्षों तक दिल्ली भार्गव सभा ने भुगुवंशी संदेश नाम से अपनी द्विमासिक पत्रिका का प्रकाशन श्री रविशंकर जी की देख-रेख में किया।

125 वर्ष

गौरवशाली वर्तमान

दिल्ली भार्गव सभा 125 वर्ष पूर्ण कर अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिये आगे बढ़ती जा रही है जिसका श्रेय दिल्ली बन्धुओं को व कर्मठ और निःस्वार्थ समाज सुधारकों को जाता है।

उन्हीं के कारण भारतीय समाज में एक सम्मानीय एवं प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त हुआ है। जाति का प्रत्येक व्यक्ति सभा, समाज की उपलब्धियों से अपने को गौरवान्वित अनुभव करता है।

अधिक जानकारी हेतु

दिल्ली भार्गव सभा के इतिहास, उपलब्धियों एवं विस्तृत जानकारी के लिए हमारी विशेष स्मारिका अवश्य देखें।

स्मारिका देखें एवं डाउनलोड करें
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